मार्कण्डेय पुराण में श्राद्ध का वर्णन
सनातन धर्म में श्राद्ध करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करते हैं उनका जीवन अत्यंत कष्टमय रहता है। यही नहीं मृत्यु के बाद भी नरक का दु:ख भोगना पड़ता है। तो आइए जानते हैं कि श्राद्ध न करने से जातकों को क्या-क्या कष्ट झेलने पड़ते हैं और इस बारे में क्या कहता है मार्कण्डेय पुराण?
श्राद्ध न करने से होती है ये हानियां
मार्कण्डेयपुराण के अनुसार जिस कुल में अपने पूर्वजों का श्राद्ध नहीं किया जाता है, वहां जन्म लेने वाली संतान रोगी होती है। इतना ही नहीं वह अल्पआयु होने के साथ ही साथ मानसिक और शारीरिक रूप से भी अत्यंत कमजोर होती है। इसके अलावा परिवार में आए दिन कोई न कोई कष्ट और क्लेश लगा ही रहता है। यानी कि श्राद्ध न किए जाने की स्थिति में घर में हमेशा दु:ख-तकलीफ लगी रहती है, कभी भी मंगल योग नहीं बनते।
पितरों को रहती है ऐसी आशा
तब करते हैं पितर ऐसा और होती है बहुत तकलीफ
धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि मृत व्यक्ति की आत्मा जब परलोक पहुंचती है तो उसके लिए वहां न अन्न होता है और न पानी। इस स्थिति में अगर उसके पुत्र-पौत्रादि भी अन्न-जल नहीं देते हैं तो पितरों की आत्मा को परलोक में भूख-प्यास से अत्यंत भयंकर पीड़ा होती है। मान्यता है कि जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करते हैं उनके पितर दु:खी रहते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि घर-परिवार में कभी संतान को कष्ट होता है तो कभी घर के मुखिया। यानी कि आए दिन कुछ न कुछ दिक्कतें होती ही रहती हैं। यही नहीं मरने के बाद उन्हें नरक जाना पड़ता है। इसलिए कहा गया है कि पूर्वजों का श्राद्ध कभी भी भूलना नहीं चाहिए। अगर भूल जाएं तो सर्व पितृ अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध करना चाहिए। मान्यता है कि जिन्हें अपने पूर्वजों की पुण्यतिथि याद न हो तो वह इस दिन श्राद्ध कर दें तो पितरों की आत्मा तृप्त हो जाती है।

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