दिव्यचिन्तनम्

दिव्यचिन्तनम्


ऐसा नहीं बोलना चाहिए

अवनति का एक महत्वपूर्ण साधन वाणी का दुरूपयोग

यद्यपि बोलना एक जबरदस्त कला है। तथापि हमें कुछ ऐसा नहीं बोलना चाहिए जिससे कि हमारा पतन होना शुरू हो जाए। आइए आज हमआपको इस विषय पर बतलाते हैं
  1. सदा असत्य अप्रिय, कठोर, छल कपट युक्त भाषा कभी नहीं बोलना चाहिए।
  2. हमेशा उपहास योग्य, अभिमान पूर्वक, दोषयुक्त  अनावश्यक,  निरर्थक, अपमानजनक भाषा नहीं बोलना चाहिए।
  3. हमेशा खण्डनात्मक, संशयात्मक, आदेशात्मक, अतिशयात्म उलझनात्मक , विरोधात्मक भाषा नहीं बोलना चाहिए।
  4. हमेशा क्रोध युक्त, कर्कश, अविश्वास युक्त, अधर्म युक्त, अज्ञान युक्त, भाषा कभी नहीं बोलना चाहिए
सारांश -तीर, तलवार परशु, कुल्हाड़ी आदि से आहत घाव भर  जाता है किन्तु कुवाक्य से आहत घाव कभी नहीं भरता है इसलिए  कदापि ऐसा नहीं बोलना चाहिए जिससे कि दूसरे लोग हमसे आहत हों और हमें हमेशा बददुआ देते रहें।
ईश्वर से प्रार्थना है कि हमें यथार्थ, हितकारी, प्रिय मधुर भाषा  बोलने की शक्ति प्रदान करें
    

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