पुरुषोत्तम मास माहात्म्य अध्याय–08

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य
  
                          अध्याय–08



 
          सूतजी बोले–‘हे तपोधन! विष्णु और श्रीकृष्ण के संवाद को सुन सन्तुष्टमन नारद, नारायण से पुनः प्रश्न करने लगे।
          नारदजी बोले–‘हे प्रभो! जब विष्णु बैकुण्ठ चले गये तब फिर क्या हुआ ? कहिये। आदिपुरुष कृष्ण और हरिसुत का जो संवाद है वह सब प्राणियों को कल्याणकर है।’

इस प्रकार प्रश्न् सुन फिर भगवान् बदरीनारायण जगत् को आनन्द देने वाला बृहत् आख्यान कहने लगे।
श्रीनारायण बोले–‘तदनन्तर विष्णु बड़े प्रसन्न होकर बैकुण्ठ गये और वहाँ जाकर हे नारद! अधिमास को अपने पास ही बसा लिया अधिमास बैकुण्ठ में वास पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और बारहों मासों का राजा होकर विष्णु के साथ रहने लगा। बारहों मासों में मलमास को श्रेष्ठ बनाकर विष्णु मन से सन्तुष्ट हुए।

हे मुने! अनन्तर भक्तों के ऊपर कृपा करने वाले भगवान् युधिष्ठिर और द्रौपदी की ओर देखते हुए, कृपा करके अर्जुन से यह बोले।’  

श्रीकृष्ण बोले–‘हे राजशार्दूल! हमको मालूम होता है कि तपोवन में आकर आप लोगों ने दुःखित होने के कारण पुरुषोत्तम मास का आदर नहीं किया। वृन्दावन की शोभा के नाथ भगवान् का प्रियपात्र पुरुषोत्तम मास आप वनवासियों का प्रमाद से व्यतीत हो गया। भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण के भय से सन्त्रस्त मन आप सब लोगों ने भय और द्वेष से मुक्त होने के कारण प्राप्त पुरुषोत्तम मास का ध्यान नहीं किया।

कृष्णद्वैपायन व्यासदेव से प्राप्त विद्या के आराधन में तत्पर, रणवीर अर्जुन के इन्द्रकील पर्वत पर चले जाने पर उसके वियोग से दुःखित आप लोगों ने पुरुषोत्तम मास को नहीं जाना। अब यदि आप यह पूछें कि हम क्या करें ? तो मैं यही कहूँगा कि भाग्य का अवलम्बन करो। पुरुषों का जैसा अदृष्ट होता है वैसा ही सदा भासता है। भाग्य से उत्पन्न जो फल है वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। सुख, दुःख भय, कुशलता इत्यादि भाग्यानुसार ही मनुष्यों को प्राप्त होते हैं। अतः अदृष्ट पर विश्वास रखने वाले आप लोगों को अदृष्ट पर निर्भर रहना चाहिये।

अब इसके बाद आप लोगों के दुःख का दूसरा कारण और बड़ा आश्चर्यजनक इतिहास के सहित कहते हैं–‘हे महाराज! हमारे मुख से कहा हुआ सुनो।

श्रीकृष्ण बोले–‘यह भाग्यशालिनी द्रौपदी पूर्व जन्म में बड़ी सुन्दरी मेधावी ऋषि के घर में उत्पन्न हुई थी। समय व्यतीत होने पर जब १० वर्ष की हुई तब क्रम से रूप और लावण्य से युक्त, अति सुन्दरी और आकर्णान्त नेत्र से शोभायमान हुई। चातुर्य गुण से युक्त यह अपने पिता की एकमात्र इकलौती कन्या थी। अतः चतुरा, गुणवती, सुन्दरी, यह पिता की बड़ी लाड़ली थी।

मेधावी ने सदा लड़के की तरह इसे माना, कभी भी अनादर नहीं किया। यह भी साहित्यशास्त्र में पण्डिता और नीतिशास्त्र में भी प्रवीणा थी। इसकी माता इसकी छोटी अवस्था में ही मर गई थी, पिता ने ही प्रसन्नता पूर्वक पाला-पोसा था। पास में रहने वाली अपनी सखी के पुत्र-पौत्रादि सुख को देख इसको भी स्पृहा हुई, और तब यह सोचने लगी कि हमें भी यह सुख कैसे प्राप्त होगा ? गुण और भाग्य का निधि, सुख देने वाला पति और सत्पुत्र कैसे होंगे ?

इस प्रकार मनोरथ विचारती हुई सोचने लगी कि पहले मेरा विवाह उपस्थित था, परन्तु भाग्य ने बिगाड़ दिया। अब क्या करने से अथवा क्या जानने से एवं किस देवता की उपासना करने से या किस मुनि के शरण जाने से अथवा किस तीर्थ का आश्रय करने से मेरी मनःकामना पूर्ण होगी। मेरा भाग्य कैसा सो गया कि कोई भी पति मुझको वरण नहीं करता है।

पण्डित भी मेरा पिता मेरे ही दुर्भाग्य से मूर्ख हो गया है, बड़ा आश्चर्य है! विवाह का समय उपस्थित होने पर भी मेरे समान वर को पिता ने नहीं दिया। मैं अपनी सहेलियों के बीच में प्रमुख हूँ, परन्तु कुमारी होने के कारण पति दुःख से पीड़ित हूँ। जैसे मेरी सखियाँ पति-सुख को भोगनेवाली हैं वैसे मैं नहीं हूँ। मेरी भाग्यवती माता क्यों पहले मर गयी ? इस प्रकार चिन्ता से व्याकुल कन्या, मनोरथ रूप समुद्र के मोहरूप जल में निमग्न हो शोकमोहरूप लहरों से पीड़ित हो गई। इसके पिता मेधावी ऋषि भी कन्यादान के लिये कन्या के समान वर ढूँढ़ने के हेतु देश-विदेश भ्रमण करने के लिये निकले, परन्तु कन्या के अनुरूप वर न मिलने से अपने मनोरथ में निराश हुए।

कन्या के और अपने भाग्य से कन्या-दानरूप संकल्प के पूर्ण न होने से, दैवयोग के कारण बड़ा भारी दारुण ज्वर उन्हें आ गया। सब अंग ऐसे फूटने लगे जैसे समस्त अंग टूट-टूट कर अलग हो जायँगे और ज्वर की ज्वाला से व्याकुल हुए श्वासोच्छ्वास लेते महादारुण मूर्च्छा से मदिरा पान से उन्मत्त की तरह पैर लड़खड़ाते गिरते-पड़ते किसी तरह घर में आये और आते ही पृथ्वी पर गिर पड़े।

भय से विह्वल कन्या जब तक पिता को देखने आये तब तक कन्या को स्मरण करते हुए मेधावी मुनि मरणासन्न हो गये। भाग्य के फलरूप बल से एकाएक काँपने लगे और कन्या-दान प्रसंग से उठा हुआ जो महोत्सव था वह जाता रहा। 

तदनन्तर पहले किये हुए गृहस्थाश्रम धर्म के परिश्रम के प्रभाव से संसारवासना को त्याग कर भगवान् में चित्त को लगाने लगे। उस मुमूर्षु मेधावी ऋषि ने शीघ्र ही नीलकमल के समान श्याम, त्रिवलि से सुन्दर आकृति वाले श्रीपुरुषोत्तम हरि का स्मरण किया, हे रास के स्वामी! हे राधारमण! हे प्रचण्ड भुजदण्ड से दूर से ही देवताओं के शत्रु दैत्य को मारने वाले! हे अति उग्र दावानल को पान कर जाने वाले! हे कुमारी गोपिकाओं के उतारे हुए वस्त्रों को हरण करने वाले! हे श्रीकृष्ण! हे गोविन्द! हे हरे! हे मुरारे! हे राधेश! हे दामोदर! हे दीनानाथ! मुझ संसार में निमग्न की रक्षा कीजिये। इन्द्रियों के ईश्वार आपको प्रणाम है।

इस प्रकार मेधावी के वचनों को दूर से ही सुन कर श्रीभगवान् के दूत चट-पट मुकुन्द लोक से आये और उस मरे हुए मुनि को हाथ से पकड़ कर ईश्वर के चरणकमलों में ले गये।

इस प्रकार अपने पिता के प्राणों को निकलता देख वह कन्या हाहाकार करके रोने लगी और पिता के शरीर को अपनी गोद में रखकर अति दुःख से विलाप करने लगी। चील्ह पक्षी की तरह बहुत देर तक विलाप करके अत्यन्त दुःख से विह्नल हुई और पिता को जीवित की तरह समझ कर बोली।

बाला बोली–‘हाय-हाय हे पिता! हे कृपासिन्धो! हे अपनी कन्या को सुख देने वाले! मुझे आज किसके पास छोड़ कर आप बैकुण्ठ सिधारे हैं ? हे तात! पितृहीन मेरी कौन रक्षा करेगा ? आज मेरे भाई, बन्धु, माता आदि कोई भी नहीं है। हे तात! मेरे भोजन, वस्त्र की चिन्ता कौन करेगा ? कैसे मैं रहूँगी, इस शून्य, वेद-ध्वनि-रहित निर्जन वन की तरह आपके घर में। हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं मर जाऊँगी ऐसे जीने में क्या रक्खा है ?

हे कन्या में प्रेम रखने वाले पिता! हे तात! विवाहविधि बिना किए ही आप कहाँ चले गये ? हे तपोनिधे! अब यहाँ आइये और अमृत के समान मधुर भाषण कीजिए। क्यों आप चुप हो गये! हे तात! बहुत देर से आप सोये हुए हैं अब जागिये।’

ऐसा कहकर आँसू बहाती हुई घड़ी-घड़ी कन्या विलाप करने लगी और पिता के मरने से दुःखित हुई आर्ता, चील्ह पक्षी की तरह मुक्तकण्ठ से रोने लगी। उस लड़की का रोदन सुन उस वन में रहने वाले ब्राह्मण आपस में कहने लगे कि इस तपोवन में अत्यन्त करुण शब्द से कौन रो रहा है ?

ऐसा कहकर सब तपस्वी चुप होकर ‘यह मेधावी ऋषि की कन्या का शब्द है’ ऐसा निश्चय कर घबड़ाये हुए हाहाकार करते मेधावी के घर में आये। और वहाँ आकर सबने कन्या के गोद में मरे हुए मेधावी ऋषि को देखा और देख कर उस वन के रहने वाले सब मुनि भी रोने लगे।

कन्या की गोद से शव को लेकर शिव मन्दिर के पास श्मशान पर गये। वहाँ काष्ठ की चिता लगाकर विधि से अन्त्येष्टि कर्मकर उसका दाह किये। दाह के अनन्तर कन्या को समझा कर सब ऋषि अपने-अपने आश्रम गये। इधर कन्या भी धैर्य धारण कर यथाशक्ति क्रिया के लिए द्रव्य खर्च किया।

इस प्रकार पिता की मरण-क्रिया को करके कन्या इसी तपोवन में निवास करने लगी और पिता के मरणरूप दुःखाग्नि से जली हुई रम्भा की तरह व्यथित होती हुई एवं बछड़े के मर जाने से जैसे गौ चिल्लाती है और खाती नहीं दुर्बल होती है वैसे ही यह बाला भी दुःखित हुई।

इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये अष्टमोऽध्यायः ॥८॥
  

स्वयंभू ज्योतिर्लिंग अमरनाथजी के बारे में फैलाया गया झूठ


पैगंबर मोहम्मद का जब जन्म भी नहीं हुआ था, तब से अमरनाथ गुफा में हो रही है पूजा-अर्चना! इसलिए इस झूठ को नकारिए कि अमरनाथ गुफा की खोज एक मुसलिम ने की थी!

जानिए अमरनाथ का पूरा इतिहास ताकि अपने बच्चों को बता सकें  .

कल बाबा बर्फानी के दर्शन के अमरनाथ यात्रा शुरू हो गयी है। अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही फिर से सेक्युलरिज्म के झंडबदारों ने गलत इतिहास की व्याख्या शुरू कर दी है कि इस गुफा को 1850 में एक मुसलिम बूटा मलिक ने खोजा था! पिछले साल तो पत्रकारिता का गोयनका अवार्ड घोषित करने वाले इंडियन एक्सप्रेस ने एक लेख लिखकर इस झूठ को जोर-शोर से प्रचारित किया था। जबकि इतिहास में दर्ज है कि जब इ⁴सलाम इस धरती पर मौजूद भी नहीं था, यानी इसलाम पैगंबर मोहम्मद पर कुरान उतरना तो छोडि़ए, उनका जन्म भी नहीं हुआ था, तब से अमरनाथ की गुफा में सनातन संस्कृति के अनुयायी बाबा बर्फानी की पूजा-अर्चना कर रहे हैं।

कश्मीर के इतिहास पर कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ और नीलमत पुराण से सबसे अधिक प्रकाश पड़ता है। श्रीनगर से 141 किलोमीटर दूर 3888 मीटर की उंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा को तो भारतीय पुरातत्व विभाग ही 5 हजार वर्ष प्राचीन मानता है। यानी महाभारत काल से इस गुफा की मौजूदगी खुद भारतीय एजेंसियों मानती हैं। लेकिन यह भारत का सेक्यूलरिज्म है, जो तथ्यों और इतिहास से नहीं, मार्क्सवादी-नेहरूवादियों के ‘परसेप्शन’ से चलता है! वही ‘परसेप्शन’ इस बार भी बनाने का प्रयास आरंभ हो चुका है।

‘राजतरंगिणी’ में अमरनाथ

अमरनाथ की गुफा प्राकृतिक है न कि मानव नर्मित। इसलिए पांच हजार वर्ष की पुरातत्व विभाग की यह गणना भी कम ही पड़ती है, क्योंकि हिमालय के पहाड़ लाखों वर्ष पुराने माने जाते हैं। यानी यह प्राकृतिक गुफा लाखों वर्ष से है। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ में इसका उल्लेख है कि कश्मीर के राजा सामदीमत शैव थे और वह पहलगाम के वनों में स्थित बर्फ के शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने जाते थे। ज्ञात हो कि बर्फ का शिवलिंग अमरनाथ को छोड़कर और कहीं नहीं है। यानी वामपंथी, जिस 1850 में अमरनाथ गुफा को खोजे जाने का कुतर्क गढ़ते हैं, इससे कई शताब्दी पूर्व कश्मीर के राजा खुद बाबा बर्फानी की पूजा कर रहे थे।

नीलमत पुराण और बृंगेश संहिता में अमरनाथ।

नीलमत पुराण, बृंगेश संहिता में भी अमरनाथ तीर्थ का बारंबार उल्लेख मिलता है। बृंगेश संहिता में लिखा है कि अमरनाथ की गुफा की ओर जाते समय अनंतनया (अनंतनाग), माच भवन (मट्टन), गणेशबल (गणेशपुर), मामलेश्वर (मामल), चंदनवाड़ी, सुशरामनगर (शेषनाग), पंचतरंगिरी (पंचतरणी) और अमरावती में यात्री धार्मिक अनुष्ठान करते थे।

वहीं छठी में लिखे गये नीलमत पुराण में अमरनाथ यात्रा का स्पष्ट उल्लेख है। नीलमत पुराण में कश्मीर के इतिहास, भूगोल, लोककथाओं, धार्मिक अनुष्ठानों की विस्तृत रूप में जानकारी उपलब्ध है। नीलमत पुराण में अमरेश्वरा के बारे में दिए गये वर्णन से पता चलता है कि छठी शताब्दी में लोग अमरनाथ यात्रा किया करते थे।

नीलमत पुराण में तब अमरनाथ यात्रा का जिक्र है जब इस्लामी पैगंबर मोहम्मद का जन्म भी नहीं हुआ था। तो फिर किस तरह से बूटा मलिक नामक एक मुसलमान गड़रिया अमरनाथ गुफा की खोज कर कर सकता है? ब्रिटिशर्स, मार्क्सवादी और नेहरूवादी इतिहासकार का पूरा जोर इस बात को साबित करने में है कि कश्मीर में मुसलमान हिंदुओं से पुराने वाशिंदे हैं। इसलिए अमरनाथ की यात्रा को कुछ सौ साल पहले शुरु हुआ बताकर वहां मुसलिम अलगाववाद की एक तरह से स्थापना का प्रयास किया गया है!

इतिहास में अमरनाथ गुफा का उल्लेख

अमित कुमार सिंह द्वारा लिखित ‘अमरनाथ यात्रा’ नामक पुस्तक के अनुसार, पुराण में अमरगंगा का भी उल्लेख है, जो सिंधु नदी की एक सहायक नदी थी। अमरनाथ गुफा जाने के लिए इस नदी के पास से गुजरना पड़ता था। ऐसी मान्यता थी कि बाबा बर्फानी के दर्शन से पहले इस नदी की मिट्टी शरीर पर लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं। शिव भक्त इस मिट्टी को अपने शरीर पर लगाते थे।

पुराण में वर्णित है कि अमरनाथ गुफा की उंचाई 250 फीट और चौड़ाई 50 फीट थी। इसी गुफा में बर्फ से बना एक विशाल शिवलिंग था, जिसे बाहर से ही देखा जा सकता था। बर्नियर ट्रेवल्स में भी बर्नियर ने इस शिवलिंग का वर्णन किया है। विंसेट-ए-स्मिथ ने बर्नियर की पुस्तक के दूसरे संस्करण का संपादन करते हुए लिखा है कि अमरनाथ की गुफा आश्चर्यजनक है, जहां छत से पानी बूंद-बूंद टपकता रहता है और जमकर बर्फ के खंड का रूप ले लेता है। हिंदू इसी को शिव प्रतिमा के रूप में पूजते हैं। ‘राजतरंगिरी’ तृतीय खंड की पृष्ठ संख्या-409 पर डॉ. स्टेन ने लिखा है कि अमरनाथ गुफा में 7 से 8 फीट चौड़ा और दो फीट लंबा शिवलिंग है। कल्हण की राजतरंगिणी द्वितीय, में कश्मीर के शासक सामदीमत 34 ई.पू से 17 वीं ईस्वी और उनके बाबा बर्फानी के भक्त होने का उल्लेख है।

यही नहीं, जिस बूटा मलिक को 1850 में अमरनाथ गुफा का खोजकर्ता साबित किया जाता है, उससे करीब 400 साल पूर्व कश्मीर में बादशाह जैनुलबुद्दीन का शासन 1420-70 था। उसने भी अमरनाथ की यात्रा की थी। इतिहासकार जोनराज ने इसका उल्लेख किया है। 16 वीं शताब्दी में मुगल बादशाह अकबर के समय के इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी पुस्तक ‘आईने-अकबरी’ में अमरनाथ का जिक्र एक पवित्र हिंदू तीर्थस्थल के रूप में किया है। ‘आईने-अकबरी’ में लिखा है- गुफा में बर्फ का एक बुलबुला बनता है। यह थोड़ा-थोड़ा करके 15 दिन तक रोजाना बढ़ता है और यह दो गज से अधिक उंचा हो जाता है। चंद्रमा के घटने के साथ-साथ वह भी घटना शुरू हो जाता है और जब चांद लुप्त हो जाता है तो शिवलिंग भी विलुप्त हो जाता है।

वास्तव में कश्मीर घाटी पर विदेशी इस्लामी आक्रांता के हमले के बाद हिंदुओं को कश्मीर छोड़कर भागना पड़ा। इसके बारण 14 वीं शताब्दी के मध्य से करीब 300 साल तक यह यात्रा बाधित रही। यह यात्रा फिर से 1872 में आरंभ हुई। इसी अवसर का लाभ उठाकर कुछ इतिहासकारों ने बूटा मलिक को 1850 में अमरनाथ गुफा का खोजक साबित कर दिया और इसे लगभग मान्यता के रूप में स्थापित कर दिया। जनश्रुति भी लिख दी गई जिसमें बूटा मलिक को लेकर एक कहानी बुन दी गई कि उसे एक साधु मिला। साधु ने बूट को कोयले से भरा एक थैला दिया। घर पहुंच कर बूटा ने जब थैला खोला तो उसमें उसने चमकता हुआ हीरा माया। वह वह हीरा लौटाने या फिर खुश होकर धन्यवाद देने जब उस साधु के पास पहुंचा तो वहां साधु नहीं था, बल्कि सामने अमरनाथ का गुफा था।

आज भी अमरनाथ में जो चढ़ावा चढ़ाया जाता है उसका एक भाग बूटा मलिक के परिवार को दिया जाता है।

 चढ़ावा देने से हमारा विरोध नहीं है, लेकिन झूठ के बल पर इसे दशक-दर-दशक स्थापित करने का यह जो प्रयास किया गया है, उसमें बहुत हद तक इन लोगों को सफलता मिल चुकी है। आज भी किसी हिंदू से पूछिए, वह नीलमत पुराण का नाम नहीं बताएगा, लेकिन एक मुसलिम गरेडि़ए ने अमरनाथ गुफा की खोज की, तुरंत इस फर्जी इतिहास पर बात करने लगेगा। यही फेक विमर्श का प्रभाव होता है, जिसमें ब्रिटिशर्स-मार्क्सवादी-नेहरूवादी इतिहासकार सफल रहे हैं।



ग्रहबाधा दूर करने का उपाय


👉🏻 *शनि, राहू-केतु आदि ग्रहों के दोष-निवारण के लिए प्रत्येक मंगलवार या शनिवार को अपने हाथ से आटे की लोई गुड़सहित प्रेमपूर्वक किसी नंदी अथवा गाय को खिलायें । कैसी भी ग्रहबाधा हो, दूर हो जायेगी ।*

ब्राह्ममुहूर्त में सोये पड़े रहने के दुष्परिणाम


*🔸जो सूर्योदय से पूर्व नहीं उठता, उसके स्वभाव में तमस छा जाता है । जीवन की शक्तियाँ ह्रास होने का और स्वप्नदोष व पानी पड़ने की तकलीफ होने का समय प्रायः रात्रि के अंतिम प्रहर में होता है । अतः प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठना चाहिए, जिससे शरीर में रज-वीर्य का ऊर्ध्वगमन हो, बुद्धि प्रखर हो तथा रोगप्रतिकारक शक्ति सुरक्षित रहे ।*

स्वास्थ्यवर्धक चोकरयुक्त आटा

प्राय: लोग खाना बनाते समय आटे को छानकर चोकर फेंक देते हैं लेकिन उन्हें यह पता नहीं कि चोकर फेंककर उन्होंने आटे के सारे रेशे (फाईबर्स) फेंक दिये हैं । चोकर स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है । चोकर के संबंध में शोध कर रहे वैज्ञानिक ने पाया कि चोकर रक्त में इम्यूनो-ग्लोब्यूलीन्स की मात्रा बढ़ाता हैं, जिससे शरीर की रोगप्रतिकारक क्षमता बढ़ती है । इससे रोगप्रतिकारक शक्ति की कमी के कारण उत्पन्न होनेवाले कई कष्टदायक रोग जैसे क्षय (टी.बी.), दमा आदि भी दूर रहते हैं ।

चोकरयुक्त आटा खाने के लाभ

  1. गेंहूँ का चोकर कब्ज हटाने में रामबाण का काम करता है । इसके प्रयोग से आँतो में चिपका हुआ मल साफ़ होता है, गैस नहीं बनती, आँते सुरक्षित व पेट मुलायम रहता है ।
  2. चोकर आमाशय के घावों को ठीक करता हैं ।
  3. रक्तवसा (कोलेस्ट्रोल) को संतुलित करके ह्रदयरोग से भी रक्षा करता है ।
  4. आंत्रपुच्छशोध (अपेंडिसाइटिस), अर्श (बवासीर) तथा भंगदर से बचाता है । बड़ी आँत एवं मलाशय कैंसर से भी रक्षा होती है ।
  5. मोटापा घटाने तथा मधुमेह निवारण में भी अचूक कार्य करता है ।
  6. अत: अति लाभकारी चोकरयुक्त आटे का ही प्रयोग करें, भूलकर भी इसे न फेंके ।
  7. सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने के लिए 
 तुलसी की अथवा गाय की ९ बार प्रदक्षिणा करने से व्यक्ति की सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है... ऐसे ही ओंकार जप से सकारात्मक ऊर्जा के साथ भगवत प्रीति भी बढ़ती है तुलसी और गौ का आभा मंडल ३ मीटर की दूरी तक फैला होता है वैज्ञानिक लेमों मूर्ति ने कहा है कि गौ, तुलसी, पीपल, सफेद आंकड़ा, गोबर ये घनात्मक ऊर्जा देते हैं ।

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