ठाकुर जी के अद्भुत नाम
ढाई अक्षरों से सजे, *कृष्ण कान्हा और श्याम।
तीन अक्षरों के, *मदन, मोहन, माधव, मुरारी,
गोकुल के, *गोपाल, गोपेश, केशव, बिहारी।
साढ़े तीन के *कन्हाई, कन्हैया, विट्ठल* कहलाए,
*गोविंद* से *बृजेश* बनकर, सबके मन को भाए।
चारअक्षरी, *यदुराज,यदुनाथ,वासुदेव,बनवारी,
*श्रीनाथजी, नटवर* बने *दामोदर, गिरधारी*।
साढ़े चार के *नन्दलाल* बने *वंशीधर, घनश्याम
*गोपेश्वर, योगेश्वर, राधाकांत, राधेश्याम।
पंचाक्षर *मधुसूदन, मुरलीधर* बने *माखनचोर,
*पांडुरंग* भी नाम धराया *राधारमण, चितचोर।
साढ़े पांच के *नंदकिशोर* बने *कुंजबिहारी
*राधावल्लभ, बृजमोहन, बांकेबिहारी।
छै के *नन्दनन्दन* ही बने, *गिरिवरधारी,
श्यामसुंदर* बने *रणछोड़राय* द्वारिका, पधारी ।
साढ़े छै के *गोवर्धनधारी* थे तो *देवकीनन्दन,
यशोदा मैया ने पाला था, कहलाए *यशोदानन्दन।
सप्ताक्षर *गिरिराजधरण* की शोभा अति प्यारी,
साढ़े सात के *बृजकुलभूषण, वृंदावनबिहारी।
कामबीजशिरोमणि* अष्टाक्षर नाम धराया,
भाद्रपद कृष्णा अष्टमी को जन्मदिन पाया।

0 टिप्पणियाँ