प्रारब्ध




👉प्रश्‍न : ऐसा कहा जाता है कि मनुष्यके जन्मके समय विधाता, ब्रह्मदेव, मनुष्यके ललाटपर उसका भाग्य लिखता है । भाग्य कैसे निश्‍चित होता है ?

👉उत्तर : हमारे सनातन धर्ममें और अन्य कई विचारधाराओंमें ‘कर्मफलन्याय’ मानते हैं, अर्थात् हम जो कर्म करेंगे उसका फल भोगना पडता है, यह सिद्धांत है ।

*🚩१. कर्मफल*

अ. सत्कर्मोंका अच्छा परिणाम होता है, उनका फल है पुण्य ।

आ. दुष्कर्मोंका बुरा परिणाम होता है, उनका फल है पाप ।

इ. कई कर्म ऐसे होते हैं, जो तत्काल फल देकर समाप्त होते हैं । उनसे पाप-पुण्य नहीं लगता; यथा कपडे धोये, तो कपडे धोनेके कर्मका, कपडे स्वच्छ होना यह फल तत्काल मिलता है । वहां पाप-पुण्य निर्मित नहीं होता । दिनभरमें हमारे अधिकांश कर्म ऐसे ही होते हैं ।

*🚩२. संचित कैसे बनता है ?*

एक जन्ममें किये कर्मोंसे बना पाप-पुण्य उसी जन्ममें भोगकर समाप्त हो, ऐसा नहीं है। यथा एक व्यक्तिने तीन हत्याएं कीं। एक प्रकरणमें पकडा जाकर दण्ड दिया गया । तो उस जन्ममें की दो अन्य हत्याओंका पाप भोगना शेष रहेगा ।

२ अ. संचित : ऐसे कई जन्मोंके पाप-पुण्यके शेष भोगको संचित कहते हैं ।

२ आ. क्रियमाण : इस जन्मके अपने कर्मोंसे अर्थात् क्रियमाणसे नया पाप-पुण्य बनता है और भोगकर शेष बचा पाप-पुण्य संचितमें जुड जाता है । यह सारा संचित अगले कुछ जन्मोंमें भोगना पडता है ।

*🚩३. प्रारब्ध*

पूरा संचित इतना अधिक होता है कि सामान्यत: अगले एक जन्ममें भोगकर समाप्त नहीं हो सकता । ऐसेमें चालू एक जन्ममें भोगनेका संचितका जो भाग, उसे प्रारब्ध कहते हैं । इसीको विधिलिखित, दैव, भाग्य, प्राक्तन (नशीब) भी कहते हैं ।

*🚩४. संचित और प्रारब्ध नष्ट करने के उपाय*

अच्छा संचित, पुण्य, नष्ट करना कोई नहीं चाहता । दुष्कृत्योंका फल, पाप नष्ट करनेकी इच्छा रहती है । ऐसा संचित नष्ट करना सामान्यत: हमारे हाथमें नहीं है । प्रारब्ध मुख्यत: भोगकर ही समाप्त करना पडता है, किंतु सनातन धर्ममें कुछ उपाय बताये गये हैं ।

४ अ. विभिन्न पापोंके लिये अलग अलग प्रायश्‍चित्त बताये गये हैं ।

४ आ. स्वयं पूरा प्रयास कर प्रारब्धको पछाडना ।

वसिष्ठमिुन श्रीरामको बताते हैं –

*‘प्राक्तनं चैहिकं चेति द्विविधं विद्धि पौरुषम् ।*
*प्राक्तनोऽद्यतनेनाशु पुरुषार्थेन जीयते ॥’*
                                                                                            *– योगवासिष्ठ, मुमुक्षव्यवहारप्रकरणम्, ४-१७*

अर्थ : ‘यह जानो कि दैव और कर्म, दोनों पुरुषार्थ हैं । हमारे अभीके पुरुषार्थसे (कर्तुत्वसे) प्राक्तनको पछाड सकते हैं ।’

४ इ. ईश्‍वरकी कृपा प्राप्त करना ।

४ ई. कुछ मंत्रोंसे भी, पंचमहापाप छोडकर अन्य, संचित पाप नष्ट हो सकते हैं ।

भगवान् श्रीकृष्ण गीतामें बताते हैं

*‘ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा ॥’*

*– गीता, अध्याय ४, श्‍लोक ३७*

अर्थ : ‘आत्मज्ञानरूप अग्नि सभी संचित कर्मोंको भस्मसात् करता है ।’

ज्ञानी निष्काम होता है, इसलिए उसके कर्मोंसे नया क्रियमाण निर्मित नहीं होता । प्रारब्ध भोगकर समाप्त होता है ।

*🚩५. निष्काम कर्म करने से प्रारब्ध और संचित निश्‍चित बढेगा नहीं ।*

एक बात निश्‍चित ही हमारे हाथमें है कि आचरण शुद्ध रखकर, यथासंभव निष्काम होकर क्रियमाण, नया पाप-पुण्य, निर्मित न होने देना; जिससे प्रारब्ध और संचित बढेगा तो नहीं ।

*🚩६. प्रारब्धकी तीव्रता एवं उपायोंकी परिणामकारकता*

अ. प्रारब्ध मंद हो तो उपर्युक्त उपायोंसे नष्ट हो सकता है ।

आ. प्रारब्ध मध्यम हो तो उपर्युक्त उपायोंसे कष्ट घट सकता है ।

इ. प्रारब्ध तीव्र हो तो उसे भोगना ही पडता है और भोगकर ही समाप्त होता है ।

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