सप्तशती का सार मंत्र

सप्तशती का सार मंत्र



ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं सः, ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल, ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥

यह मंत्र सप्तशती के मुख्य और सिद्ध मंत्रों में से एक माना जाता है। इस मंत्र का नियमित उच्चारण विशेष रूप से प्रभावी होता है और इसे सप्तशती के अन्य मंत्रों के मुकाबले अधिक शक्तिशाली माना जाता है। इसके जाप से साधक को विशेष प्रकार की सिद्धि प्राप्त होती है और इसका प्रभाव अत्यधिक शक्तिशाली होता है।

मंत्र जाप की विधि:

  • इस मंत्र का जाप 108 बार नियमित रूप से किया जाना चाहिए।
  • यदि इस मंत्र को सिद्ध करना है तो एक लाख इक्यावन हज़ार बार जाप की आवश्यकता होती है।
  • मंत्र जाप के दौरान निष्ठा और श्रद्धा के साथ ध्यान केंद्रित करके उच्चारण करें। ध्यान रखें कि जाप के दौरान मानसिक एकाग्रता और शुद्ध उच्चारण बहुत महत्वपूर्ण हैं।
  • इसे किसी विशिष्ट आसन पर बैठकर, पूरी मानसिक एकाग्रता के साथ किया जाना चाहिए।
  • मंत्र को उच्चारित करते समय आपको कातर भाव से प्रार्थना करते हुए इसे सही विधि से बोलना चाहिए।

सिद्धि प्राप्ति हेतु:

इस मंत्र का जाप यदि सही तरीके से और पूरे समर्पण के साथ किया जाता है तो, साधक को हर प्रकार की सिद्धि प्राप्त हो सकती है।

ध्यान रखें:

  • मंत्र का उच्चारण शुद्ध और सही होना चाहिए।
  • मानसिक एकाग्रता और शुद्ध भाव से जाप करें।
  • इस मंत्र के साथ कोई भी प्रकार का ध्यान भंग नहीं होना चाहिए।

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
यह श्लोक भी एक विशेष महत्व रखता है और इसे मंत्र जाप के बाद उच्चारण करना चाहिए। यह श्लोक कल्याणकारी है और सभी प्रकार की विपत्तियों से मुक्ति प्राप्त करने में मदद करता है।

ॐ तत् सत् ॐ

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