श्री हनुमदष्टकम् हनुमान जी की महिमा को वर्णित करने वाला एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र

 श्री हनुमदष्टकम्


**श्री हनुमदष्टकम्** हनुमान जी की महिमा को वर्णित करने वाला एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। इसमें हनुमान जी की शक्तियों, गुणों और उनके भक्तों पर कृपा की बात की गई है। यह स्तोत्र भक्तों को संकटों से मुक्ति और हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त करने की प्रेरणा देता है।

#### संस्कृत पाठ:


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श्रीरघुराजपदाब्जनिकेतन
पंकजलोचन मंगलराशे
चंडमहाभुजदंड
सुरारिविखंडनपंडित पाहि दयालो।
पातकिनं च समुद्धर मां
महतां हि सतामपि मानमुदारं।।1।।

पुत्रधनस्वजनात्मगृहादिषु
सक्तमतेरतिकिल्बिषमूर्तेः।
केनचिदप्यमलेन
पुराकृतपुण्यसुपुंजलवेन विभो वै
त्वां भजतो मम देहि दयाघन
हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यम्।।2।।

संसृतिकूपमनल्पमघोरनिदाघनिदानमजस्रमशेषं
प्राप्य सुदुःखसहस्रभुजंगविषैकसमाकुलसर्वतनोर्मे।
घोरमहाकृपणापदमेव गतस्य
हरे पतितस्य भवाब्धौ
त्वां भजतो मम देहि दयाघन
हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यम्।।3।।

संसृतिसिंधुविशालकरालमहाबलकालझषग्रसनार्तं
व्यग्रसमग्रधियं कृपणं च
महामदनक्रसुचक्रहृतासुम्।
कालमहारसनोर्मिनिपीडितमुद्धर
दीनमनन्यगतिं मां

त्वां भजतो मम देहि दयाघन
हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यम्।।4।।

संसृतिघोरमहागहने चरतो
मणिरंजितपुण्यसुमूर्तेः
मतनथभीकरघोरमहोग्रमृगप्रवरार्दितगात्रसुसंधेः।
मत्सरतापविशेषनिपीडितबाह्यमतेश्च कथं चिदमेयं

त्वां भजतो मम देहि दयाघन
हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यम्।।5।।

संसृतिवृक्षमनेकशताघनिदानमनंतविकर्मसुशाखं
दुःखफलंकरणादिपलाशमनंगसुपुष्पमचिंत्यसुमूलम्

तं ह्यधिरुह्य हरे पतितं शरणागतमेव विमोचय मूढं

त्वां भजतो मम देहि दयाघन
हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यम्।।6।।

संसृतिपन्नगवक्त्रभयंकरदंष्ट्रमहाविषदग्धशरीरं
प्राणविनिर्गमभीतिसमा
कुलमंदमनाथमतीव विषण्णम्।
मोहमहाकुहरे पतितं
दययोद्धर मामजितेंद्रियकामं

त्वां भजतो मम देहि दयाघन
हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यम्।।7।।

इंद्रियनामकचोरगणैर्हृततत्त्वविवेकमहाधनराशिं
संसृतिजालनिपातितमेव
महाबलिभिश्च विखंडितकायम्।
त्वत्पदपद्ममनुत्तममाश्रितमाशु
कपीश्वर पाहि कृपालो

त्वां भजतो मम देहि दयाघन
हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यम्।।8।।

ब्रह्ममरुद्गणरुद्रमहेंद्रकिरीटसुकोटिलसत्पदपीठं
दाशरथिं जपति क्षितिमंडल
एष निधाय सदैव हृदब्जे|
तस्य हनूमत एव शिवंकरमष्टकमेतदनिष्टहरं वै
यः सततं हि पठेत्स नरो लभतेऽच्युतरामपदाब्जनिवासम्।।9।।

```

### हिन्दी अनुवाद:


1. श्री रघुराज के चरणकमल में निवास करने वाले, पंकज नेत्र वाले, मंगल की राशि वाले, चंड और महाबल वाले, देवताओं के शत्रुओं को समाप्त करने में कुशल, दयालु हनुमान जी को नमस्कार। आप पातकियों को उद्धार करने वाले हैं, कृपया मुझे भी उबारें और महान मान प्रदान करें।

2. जो पुत्र, धन, स्वजन और गृहस्थियों में अटूट विश्वास रखते हैं, जो सभी पापों का रूप हैं, उन भक्तों को आपके परम पवित्र चरणों से शरणागत होकर इस संसार के दुखों से मुक्ति मिले।

3. संसार के महान अंधकार और ज्वाला से भरे हुए बुरे पापों के समुद्र में डूबे हुए मुझ दीन को, जिनके पास सैकड़ों कष्ट और बिषाक्त विचार हैं, कृपया उबारें और शरणागत को बचाएं।

4. संसार के विशाल समुद्र में, विशाल और बलशाली काल के बड़े जीव के द्वारा ग्रसित, जो बहुत ही व्यग्र और अत्यंत दुखी हैं, कृपया मुझे इस कष्टपूर्ण स्थिति से उबारें।

5. संसार के अंधकारपूर्ण और गहरे गड्ढों में विचरते हुए, और मणि से सज्जित पुण्यरूप वाले, मरे हुए मनुष्यों की विकृति और संकट को दूर करने वाले, आप दीनदयालु हनुमान जी, मुझे संकटों से उबारें।

6. संसार के वृक्ष के अनेक शाखाओं से भरे हुए, अनंत कर्मों से जुड़े, दुःख और विपत्ति से घिरे, कृपया मुझे शरणागत को शीघ्र उबारें।

7. इन्द्रिय के चोरों और भयंकर दांतों वाले नागों द्वारा हृत तत्वज्ञान की पूंजी को संपूर्ण रूप से नष्ट कर दिया गया है, कृपया मुझे शीघ्र उबारें और शरणागत को कृपादृष्टि प्रदान करें।

8. ब्रह्मा, मरुद्गण, रुद्र, महेंद्र और अन्य देवताओं के द्वारा पूजित, दाशरथि की आराधना करने वाले, जो स्थिर रूप से अपने हृदय में निवास करते हैं, इस स्तोत्र को पढ़ने वाले व्यक्ति को सच्चा शरणागत और सर्वश्रेष्ठ शरण में लाते हैं।

**इति श्री हनुमदष्टकम्**

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