शिवजी को कैसे मिले नाग, डमरू, त्रिशूल, त्रिपुंड और नंदी?
#### शिव जी का त्रिशूल
भगवान शिव का ध्यान करने मात्र से मन में जो एक छवि उभरती है वो एक वैरागी पुरुष की। उनके एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ में डमरू, गले में सर्प माला, सिर पर त्रिपुंड चंदन, माथे पर अर्धचन्द्र, और सिर पर जटाजूट जिससे गंगा की धारा बह रही है। इनके साथ इनका वाहन नंदी भी नजर आता है। शिव के साथ यह 7 चीजें जुड़ी हुई हैं।
भगवान शिव सर्वश्रेष्ठ सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता हैं, लेकिन पौराणिक कथाओं में इनके दो प्रमुख अस्त्रों का जिक्र आता है, एक धनुष और दूसरा त्रिशूल। त्रिशूल का प्रयोग शिव जी ने कई बार किया है। त्रिशूल से शिव जी ने शंखचूर का वध किया था। गणेश जी का सिर काटा था और वाराह अवतार में मोह के जाल में फंसे विष्णु जी का मोह भंग किया था।
माना जाता है कि सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मनाद से जब शिव प्रकट हुए तो साथ ही रज, तम, सत यह तीनों गुण भी प्रकट हुए। यही तीनों गुण शिव जी के तीन शूल यानी त्रिशूल बने। इन गुणों के संतुलन के लिए शिव ने त्रिशूल को अपने हाथों में धारण किया।
#### शिव जी का डमरू
भगवान शिव को संहारकर्ता के रूप में वेदों और पुराणों में बताया गया है। शिव का नटराज रूप ठीक इसके विपरीत है, यह प्रसन्न होते हैं और नृत्य करते हैं। इस समय शिव के हाथों में एक वाद्ययंत्र होता है जिसे डमरू कहते हैं। इसका आकार रेत घड़ी जैसा है जो दिन रात और समय के संतुलन का प्रतीक है।
भगवन शिव के हाथों में डमरू आने की कहानी बड़ी ही रोचक है। सृष्टि के आरंभ में जब देवी सरस्वती प्रकट हुईं, तब देवी ने अपनी वीणा के स्वर से सृष्टि में ध्वनि को जन्म दिया। लेकिन यह ध्वनि सुर और संगीत विहीन थी। उस समय भगवान शिव ने नृत्य करते हुए चौदह बार डमरू बजाए और इस ध्वनि से व्याकरण और संगीत के धन्द, ताल का जन्म हुआ।
#### शिव के गले में विषधर नाग
भगवान शिव के साथ हमेशा नाग होता है। इस नाग का नाम है वासुकी। पुराणों में बताया गया है कि यह नागों के राजा हैं और नागलोक पर इनका शासन है। सागर मंथन के समय इन्होंने रस्सी का काम किया था जिससे सागर को मथा गया था। वासुकी नाग शिव के परम भक्त थे। इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने इन्हें नागलोक का राजा बना दिया और साथ ही अपने गले में आभूषण की भांति लिपटे रहने का वरदान दिया।
#### नंदी ऐसे बने शिव के वाहन
पुराणों के अनुसार नंदी और शिव वास्तव में एक ही हैं। शिव ने ही नंदी रूप में जन्म लिया था। कथा है कि शिलाद नाम के ऋषि मोह माया से मुक्त होकर तपस्या में लीन हो गए। इससे इनके पूर्वज और पितरों को चिंता हुई कि इनका वंश समाप्त हो जाएगा। पितरों की सलाह पर शिलाद ने शिव जी की तपस्या करके एक अमर पुत्र को प्राप्त किया जो नंदी नाम से जाना गया। शिव का अंश होने के कारण नंदी शिव के करीब रहना चाहता था। शिव जी की तपस्या से नंदी शिव के गणों में प्रमुख हुए और वृषभ रूप में शिव का वाहन बनने का सौभाग्य प्राप्त किया।
#### शिव के सिर पर चन्द्र कैसे पहुंचे
शिव पुराण के अनुसार चन्द्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से हुआ था। यह कन्याएं 27 नक्षत्र हैं। इनमें चन्द्रमा रोहिणी से विशेष स्नेह करते थे। इसकी शिकायत जब अन्य कन्याओं ने दक्ष से की तो दक्ष ने चन्द्रमा को क्षय होने का शाप दे दिया। इस शाप से बचने के लिए चन्द्रमा ने भगवान शिव की तपस्या की। चन्द्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने चन्द्रमा के प्राण बचाए और उन्हें अपने शीश पर स्थान दिया।
#### शिव के माथे पर त्रिपुंड
भगवान शिव के माथे पर भभूत (राख) से बनी तीन रेखाएं हैं। माना जाता है कि यह तीनों लोको का प्रतीक हैं। इसे रज, तम और सत गुणों का भी प्रतीक माना जाता है। पुराणों के अनुसार दक्ष प्रजपति के यज्ञ कुंड में सती के आत्मदाह करने के बाद भगवान शिव उग्र रूप धारण कर लेते हैं और सती के देह को कंधे पर लेकर त्रिलोक में हाहाकार मचाने लगते हैं। अंत में विष्णु चक्र से सती के देह को खंडित कर देते हैं। इसके बाद भगवान शिव अपने माथे पर हवन कुंड की राख मलते और इस तरह सती की याद को त्रिपुंड रूप में माथे पर स्थान देते हैं।
#### इस तरह शिव की जटा में समाई गंगा
भगवान शिव के माथे पर गंगा के विराजमान होने की घटना का संबंध राजा भगीरथ से माना जाता है। कथा है कि भगीरथ ने अपने पूर्वज सगर के पुत्रों को मुक्ति दिलाने के लिए गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा था। लेकिन गंगा के वेग से पृथ्वी की रक्षा के लिए शिव जी ने उन्हें अपनी जटाओं में बांध लिया। ऐसा माना जाता है कि गंगा शिव के करीब रहना चाहती थीं, इसलिए धरती पर उतरने से पहले प्रचंड रूप धारण कर लिया। इस स्थिति को संभालने के लिए शिव जी ने गंगा को अपनी जटाओं में स्थान दिया।
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