श्री गौरीशाष्टकम्: शिव और पार्वती की महिमा में निहित जीवन के सत्य का अद्भुत स्तोत्र


श्री गौरीशाष्टकम् का यह भव्य स्तोत्र शिव के गौरी रूप (पार्वती के साथ शिव) की महिमा और साधक के शुद्धिकरण के लिए है। इस स्तोत्र में साधक को जीवन के असारता और माया के धोखे से सावधान करते हुए, शिव के चरणों में ध्यान केंद्रित करने की प्रेरणा दी गई है।

"श्री गौरीशाष्टकम्: शिव और पार्वती की महिमा में निहित जीवन के सत्य का अद्भुत स्तोत्र"

यहां पर प्रत्येक श्लोक के कुछ मुख्य अर्थ दिये गये हैं:


प्रथम श्लोक

इसमें साधक को यह संदेश दिया गया है कि वह शिव के गौरी रूप का भजन करें। जीवन के सभी भौतिक संबंध जैसे परिवार, संपत्ति, आदि अस्थायी हैं, और केवल शिव के चरणों में ध्यान लगाना ही सत्य है।


द्वितीय श्लोक

यह श्लोक जीवन के असारता को उजागर करता है। साधक को समझाना कि संसार की हर चीज़ अस्थिर है, और यह सब केवल भ्रम है। यही कारण है कि हमें हमेशा आत्मा के सत्य को पहचानने का प्रयास करना चाहिए।


तृतीय श्लोक

पुनः जन्म और मृत्यु के चक्र को निरर्थक बताते हुए यह श्लोक सिखाता है कि माया के प्रभाव में हमें बार-बार जन्म-मृत्यु के जाल में फंसा दिया जाता है, इसलिए हमें ध्यान में केवल शिव के शरण में जाना चाहिए।


चतुर्थ श्लोक

माया की उत्पत्ति और उसके भ्रम के बारे में बताया गया है। असली ज्ञान के बिना माया की जाल को पहचान पाना असंभव है। इसलिए साधक को विषयों में उलझने के बजाय, केवल शिव के ध्यान में रम जाना चाहिए।


पञ्चम श्लोक

इस श्लोक में माया के भ्रम और ब्रह्म के सत्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। यह श्लोक मनुष्य को बार-बार अपने विचारों और दृष्टिकोणों पर ध्यान देने की सलाह देता है।


षष्ठ श्लोक

यह श्लोक बताता है कि सत्य का अनुभव करने के लिए इन्द्रिय और मन का दमन आवश्यक है। ध्यान और योग के माध्यम से ही आत्मा की मुक्ति संभव है।


सप्तम श्लोक

साधक को यह संदेश दिया गया है कि "सोऽहम्" का चिंतन करते हुए वह आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर सकता है। शिव के साथ एकता का अनुभव करने से ही वह अद्वैत का साक्षात्कार कर सकता है।


अष्टम श्लोक

यह श्लोक बताता है कि नित्य रूप से इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति ब्रह्म में लीन हो जाता है और सत्य की प्राप्ति होती है। शिव के चरणों में निरंतर ध्यान और भक्ति से ही मोक्ष प्राप्त होता है।


इस प्रकार, गौरीशाष्टकम् साधक को माया के भ्रम से पार पाकर शिव के दिव्य स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है। यह स्तोत्र जीवन में गहरी निष्ठा और आत्मसमर्पण की आवश्यकता को दर्शाता है।





॥ श्री गौरीशाष्टकम ॥

भज गौरीशं भज गौरीशंगौरीशं भज मन्दमते।
जलभवदुस्तरजलधिसुतरणंध्येयं चित्ते शिवहरचरणम्।
अन्योपायं न हि न हि सत्यंगेयं शङ्कर शङ्कर नित्यम्।
भज गौरीशं भज गौरीशंगौरीशं भज मन्दमते॥

दारापत्यं क्षेत्रं वित्तंदेहं गेहं सर्वमनित्यम्।
इति परिभावय सर्वमसारंगर्भविकृत्या स्वप्नविचारम्।
भज गौरीशं भज गौरीशंगौरीशं भज मन्दमते॥

मलवैचित्ये पुनरावृत्ति:पुनरपि जननीजठरोत्पत्ति:।
पुनरप्याशाकुलितं जठरं किंनहि मुञ्चसि कथयेश्चित्तम्।
भज गौरीशं भज गौरीशंगौरीशं भज मन्दमते॥

मायाकल्पितमैन्द्रं जालं नहि तत्सत्यं दृष्टिविकारम्।
ज्ञाते तत्त्वे सर्वमसारं माकुरु मा कुरु विषयविचारम्।
भज गौरीशं भज गौरीशंगौरीशं भज मन्दमते॥

रज्जौ सर्पभ्रमणा-रोपस्तद्वद्ब्रह्मणि जगदारोप:।
मिथ्यामायामोहविकारंमनसि विचारय बारम्बारम्।
भज गौरीशं भज गौरीशंगौरीशं भज मन्दमते॥

अध्वरकोटीगङ्गागमनं कुरुतेयोगं चेन्द्रियदमनम्।
ज्ञानविहीन: सर्वमतेन नभवति मुक्तो जन्मशतेन।
भज गौरीशं भज गौरीशंगौरीशं भज मन्दमते॥

सोऽहं हंसो ब्रह्मैवाहंशुद्धानन्दस्तत्त्वपरोऽहम्।
अद्वैतोऽहं सङ्गविहीनेचेन्द्रिय आत्मनि निखिले लीने।
भज गौरीशं भज गौरीशंगौरीशं भज मन्दमते॥

शङ्करकिंङ्कर मा कुरु चिन्तांचिंतामणिना विरचितमेतत्।
य: सद्भक्त्या पठति हि नित्यंब्रह्मणि लीनो भवति हि सत्यम्।
भज गौरीशं भज गौरीशंगौरीशं भज मन्दमते॥

॥ इति गौरीशाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

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