श्री भवान्यष्टकम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक प्रसिद्ध स्तोत्र

**श्री भवान्यष्टकम्** आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक प्रसिद्ध स्तोत्र है जिसमें माता भगवती भवानि की स्तुति की गई है। यह स्तोत्र भक्ति और समर्पण का अद्वितीय उदाहरण है, जिसमें भक्त अपने सभी बंधनों और कठिनाइयों को भवानि माँ के चरणों में समर्पित करता है। 

#### स्तोत्र का पाठ:


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न तातो न माता न बन्धुर्न दाता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥

भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः
पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः।
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥

न जानामि दानं न च ध्यानयोगं
न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम्।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगम्
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥

न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं
न जानामि मुक्ति लयं वा कदाचित्।
न जानामि भक्ति व्रतं वापिमातर्गतिस्त्वं
गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥

कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः
कुलाचारहीनः कदाचारलीनः।
कुदृष्टि: कुवाक्यप्रबन्धः सदाहम्गतिस्त्वं
गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥

प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं
दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्येगतिस्त्वं
गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥

विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे
जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥

अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो
महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्ट: सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥

॥ इति भवान्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥
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श्री भवान्यष्टकम् का महत्व


श्री भवान्यष्टकम् के पाठ से व्यक्ति को जीवन की कठिनाइयों और समस्याओं से मुक्ति मिलती है। यह स्तोत्र न केवल भक्त की मनोकामनाओं को पूर्ण करता है, बल्कि उसे आध्यात्मिक शांति और सद्गति भी प्रदान करता है। 

यह स्तोत्र हर रोज़ पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में शांति, समृद्धि और सुख का संचार होता है। भक्तजन इसे श्रद्धा और भक्ति के साथ नित्य पाठ कर सकते हैं।

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