सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र एक शक्तिशाली पाठ है, जिसका उल्लेख श्रीभृगु संहिता के सर्वारिष्ट निवारण खंड में किया गया है। इसका पाठ करने से जीवन की बाधाओं का निवारण होता है और अनेक अनिष्टकारी तत्वों से रक्षा होती है। इस स्तोत्र के 40 पाठ करने की विधि भी इसमें दी गई है। इस पाठ को करते समय विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि इसे किसी देवी-देवता की प्रतिमा या यंत्र के सामने बैठकर ही किया जाए।
पाठ से पूर्व दीप, धूप, एवं अन्य पूजा सामग्री से पूजन करने के बाद ही इसका पाठ आरंभ करना चाहिए। इसे अत्यंत फलदायी माना गया है, विशेषकर जब ‘स्वाहा’ और ‘नम:’ के उच्चारण के साथ घी मिश्रित गुग्गुल की आहुति दी जाती है।
सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र पाठ की विधि और लाभ
- देवी-देवता की मूर्ति या यंत्र के सामने बैठकर पाठ करें।
- दीप और धूप से पूजन करें।
- ‘स्वाहा’ और ‘नम:’ के उच्चारण के साथ घी मिश्रित गुग्गुल से आहुतियां दें।
इस पाठ का प्रतिदिन अभ्यास करने से मनुष्य के जीवन की अनेक कठिनाइयों का निवारण होता है। यह पाठ मानसिक और शारीरिक बल प्रदान करता है और संपूर्ण सुख-शांति प्रदान करता है।
स्तोत्र का प्रारंभिक पाठ
ॐ गं गणपतये नम:।
सर्व-विघ्न-विनाशनाय, सर्वारिष्ट निवारणाय, सर्व-सौख्य-प्रदाय, बालानां बुद्धि-प्रदाय, नाना-प्रकार-धन-वाहन-भूमि-प्रदाय, मनोवांछित-फल-प्रदाय रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।
ॐ गुरवे नम:, ॐ श्रीकृष्णाय नम:, ॐ बलभद्राय नम:, ॐ श्रीरामाय नम:, ॐ हनुमते नम:, ॐ शिवाय नम:, ॐ जगन्नाथाय नम:, ॐ बदरीनारायणाय नम:, ॐ श्री दुर्गा-देव्यै नम:।
इस स्तोत्र के उच्चारण से मानसिक शांति मिलती है, शरीर की समस्त बाधाओं का निवारण होता है और सभी प्रकार के संकट दूर होते हैं। यह स्तोत्र न केवल सुरक्षा प्रदान करता है बल्कि सौभाग्य, धन, और आरोग्यता भी प्रदान करता है।
ध्यान दें: इस प्रकार के स्तोत्रों का पाठ विधिपूर्वक और विश्वास के साथ करना चाहिए।

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