गरुड़ पुराण के सातवें अध्याय में राजा बभ्रुवाहन और एक प्रेत की कथा का वर्णन है, जिसमें प्रेत से मुक्ति प्राप्त करने के उपायों का उल्लेख किया गया है। इस अध्याय में भगवान विष्णु ने गरुड़जी से पूछा कि मनुष्यों को पाप के प्रभाव से बचाने के लिए क्या उपाय है, जिससे वे यम की यातनाओं से बच सकें। भगवान विष्णु ने उत्तर दिया कि पुत्र होने से व्यक्ति पितृ-ऋण से मुक्त हो जाता है, और पुत्र द्वारा किए गए श्राद्ध से पितर स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार पुत्र के बिना व्यक्ति को और्ध्वदैहिक क्रिया द्वारा मुक्ति मिलती है।
राजा बभ्रुवाहन, जो धर्मपरायण और ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धावान थे, एक बार शिकार के लिए जंगल में गए और वहाँ एक विकृत प्रेत से मिले। प्रेत ने राजा से अपनी मुक्ति की प्रार्थना की और बताया कि वह वैश्य जाति का था और कभी भी पिण्डदान या श्राद्ध से वंचित था। उसने बताया कि उसके पास कोई संतान नहीं थी, इसलिए उसके पाप का निवारण नहीं हो सका और वह प्रेत बन गया।
राजा बभ्रुवाहन ने प्रेत के कहने पर नारायण बलि की विधि से उसे मुक्ति दिलाने के लिए और्ध्वदैहिक क्रिया की। इसके बाद प्रेत ने राजा से कहा कि वह सोने का एक घट बना कर उसमें दूध, घी और अन्य द्रव्य भरकर ब्राह्मणों को दान करे, ताकि उसकी प्रेतवस्था समाप्त हो सके। राजा ने इस विधि से उस प्रेत के उद्धार के लिए दान और श्राद्ध किया।
कथा में यह भी उल्लेख है कि प्रेत द्वारा दिए गए वचन के अनुसार राजा ने विधिपूर्वक और्ध्वदैहिक क्रिया का पालन किया और अंत में प्रेत को मुक्ति मिली। इसके बाद प्रेत स्वर्ग को चला गया। यह कथा यह संदेश देती है कि पितरों के लिए किए गए श्राद्ध से उन्हें सद्गति मिलती है, और दूसरे के द्वारा किए गए श्राद्ध से प्रेत भी मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
इस अध्याय से यह सिखने को मिलता है कि दान, श्राद्ध और पिण्डदान से न केवल पितरों का उद्धार होता है, बल्कि प्रेतों को भी मुक्ति मिल सकती है। धर्म, दान और परिवार के कर्तव्यों को निभाना आवश्यक है ताकि आत्मा को शांति और मुक्ति प्राप्त हो सके।

0 टिप्पणियाँ