श्लोक

क्षान्तिश्चेत्कवचेन किं किमरिभिः
क्रोधोऽस्ति चेद्देहिनां,
ज्ञातिश्चेदनलेन किं यदि सुहृद्
दिव्यौषधेः किं फलम्
किं सर्पैर्यदि दुर्जनाः किमु धनै:
विद्यानवद्या यदि,
व्रीडा चेत्किमु भूषणैः सुकविता
यद्यस्ति राज्येन किम्॥

(नीतिशतक - २१)

अर्थात् 👉 यदि मनुष्य के पास क्षमा है तो कवच की क्या आवश्यकता? यदि क्रोध है तो शत्रुओं की क्या आवश्यकता ? यदि स्वजातीय हैं तो अग्नि की क्या आवश्यकता ? यदि मित्र हैं तो औषधियों की क्या आवश्यकता ? यदि दुर्जन हैं तो सर्पों की क्या आवश्यकता ? यदि निर्दोष विद्या है तो धन की क्या आवश्यकता ? यदि लज्जा है तो आभूषण की क्या आवश्यकता ? यदि काव्य-शक्ति है तो राज्य की क्या आवश्यकता ?


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