श्री जगन्नाथ जी की आँखें बड़ी क्यों हैं? — एक दिव्य प्रेम कथा
भगवान जगन्नाथ की बड़ी-बड़ी आँखें सिर्फ एक विशेष आकृति नहीं, बल्कि उनके दिव्य प्रेम और भावों की गहरी अभिव्यक्ति हैं। इस रूप के पीछे एक अद्भुत और मार्मिक कथा छिपी है, जो प्रेम, भक्ति और भावना से भरपूर है।
कथा का प्रारंभ: द्वारिका में प्रेम लीलाओं का वर्णन
एक बार द्वारिका के राजमहल में, रुक्मिणी आदि रानियों ने माता रोहिणी से श्रीकृष्ण और गोपियों की बचपन की प्रेम लीलाओं को सुनने का आग्रह किया।
पहले माता रोहिणी ने इन लीलाओं को गोपनीय रखने का निर्णय लिया, लेकिन रानियों के लगातार आग्रह पर वह मान गईं। परन्तु उन्होंने अपनी पुत्री सुभद्रा को महल के बाहर पहरे पर खड़ा कर दिया ताकि कोई अनधिकारी इस दिव्य कथा को न सुन सके।
गोपियों के निष्काम प्रेम का विस्मय
महल के भीतर माता रोहिणी ने गोपियों के निष्काम और परोपकारी प्रेम के भाव बताए, जिनमें वे अपने सारे सुख त्याग कर श्रीकृष्ण को आनंदित करती थीं। यह प्रेम इतना शुद्ध और पवित्र था कि सुनते ही श्रीकृष्ण भाव-विभोर हो उठे।
उनकी आँखें धीरे-धीरे बड़ी होने लगीं, क्योंकि वे गोपियों के समर्पण और त्याग को महसूस कर रहे थे। उनके सम्पूर्ण शरीर में प्रेम का इतना प्रबल आवेश उत्पन्न हुआ कि शेष शरीर सिकुड़ गया, परंतु उनकी आँखें भावों से भरकर अनंत तक फैलती चली गईं।
सुभद्रा और बलराम भी भावानुरक्त हुए
श्रीकृष्ण की यह अनोखी अवस्था देख सुभद्रा और बलराम भी उसी प्रेम में डूब गए। तीनों की यह महाभाव स्थिति देखकर, देवर्षि नारद जी वहाँ आए। उन्होंने इस दिव्य प्रेम को देखकर भगवान की स्तुति की और उनसे प्रार्थना की कि इस रूप को कलियुग में भी जीवित रखा जाए ताकि भक्त इससे प्रेरणा लें।
भगवान जगन्नाथ के रूप का आरंभ
भगवान ने नारद जी को वरदान दिया कि कलियुग में वह इसी प्रेम-प्रेरित अवस्था में जगन्नाथ के रूप में पुरी में विराजेंगे। उनकी बड़ी-बड़ी आँखें उस अपार प्रेम और भक्तिपूर्ण भावना की निशानी हैं, जो जगन्नाथ जी के रूप में पूरी मानवता को आशीर्वाद देती हैं।
यह रूप भक्तों को निष्काम भक्ति, प्रेम और समर्पण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
निष्कर्ष
श्री जगन्नाथ जी की आँखें केवल दृष्टि का अंग नहीं, बल्कि उनकी दिव्य भक्ति और प्रेम के भावों की अभिव्यक्ति हैं। इस रूप से वे हमें प्रेम, त्याग और भक्ति की राह दिखाते हैं। उनकी आँखों में छुपा है वह अमर संदेश — प्रेम ही परम शक्ति है।
जय जगन्नाथ!
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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