नवग्रह गायत्री मन्त्र
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ॐ
==================================जन्म भूर्गोत्रमग्निश्च वर्णः स्थानं मुखानि च।
योऽज्ञात्वा कुरुते शान्ति ग्रहास्तेनावमानिताः ॥
ग्रहशान्ति के सन्दर्भो में अध्ययन करने पर निर्विवाद रुप से यह स्वीकार किया जा सकता है कि ४। ८। १२ स्थानों में रहने वाले ग्रहों के कुप्रभाव को न्यूनाधिक मात्रा में अनुकूल करने के लिये ग्रह शान्ति का विशेष महत्व है।
यही कारण है कि ग्रह गणिताचार्यों ने न केवल ग्रहों के प्रभावों का ही निर्देश किया अपितु उन ग्रहों की अनुकूलता के लिए 'ग्रह शान्ति' जैसे साधारण एवं सुसाध्य उपायों का विश्लेषणात्मक अध्ययन भी किया।
प्राचीन मन्त्रदृष्टा ऋषियों ने जप के लिये ग्रहों की गायत्री का भी निर्देश किया हैं।
सूर्य गायत्री मन्त्र-
ॐ आदित्याय विद्महे प्रभाकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥
चन्द्र गायत्री मन्त्र-
ॐ अमृताड्गाय विदमहे कलारुपाय धीमहि तन्नः सोमः प्रचोदयात् ॥
भौम गायत्री मन्त्र-
ॐ अंगारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥
बुध गायत्री मन्त्र-
ॐ सौम्यरुपाय विद्महे वाणेशाय धीमहि तन्नौ सौम्यः प्रचोदयात् ॥
गुरु गायत्री मन्त्र-
ॐ अंगिरसाय विद्महे दण्डायुधाय धीमहि तन्नो जीवः प्रचोदयात् ॥
शुक्र गायत्री मन्त्र-
ॐ भृगुसुताय विद्महे विन्देशाय धीमहि तन्नो शुक्रः प्रचोदयात् ॥
शनि गायत्री मन्त्र-
ॐ सूर्य पुत्राय विद्महे मृत्यु रुपाय धीमहि तन्नो सौरिः प्रचोदयात् ॥
राहु गायत्री मन्त्र-
ॐ शिरोरुपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात् ॥
केतु गायत्री मन्त्र-
ॐ गदाहस्ताय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो केतुः प्रचोदयात् ॥
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समाप्त
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नमः
शशी महाराज
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