गौरी माता का ध्यान मंत्र और ध्यान करने की विधि इस प्रकार है:

गौरी माता का ध्यान मंत्र और ध्यान करने की विधि इस प्रकार है:

गौरी माता का ध्यान मंत्र

"या श्रीः स्वधाऽस्वाहा सुधा मतिरहो योश्च सिद्धिः सदा
या वै सर्वविधाऽनुकूलचितता या सर्वमाता ध्रुवा।
या वै ब्रह्म सनातनी भगवती या चाश्रिता सर्वदा
सा मां पातु शुभाऽशुभेषु सततं श्री महादेवप्रिया॥"

गौरी माता ध्यान की विधि

  1. स्वच्छता: सबसे पहले स्नान करके साफ कपड़े पहनें।
  2. पूजन स्थान: एक शांत और पवित्र स्थान का चयन करें।
  3. आसन: किसी आसान पर बैठें, जैसे कि कुश का आसन या कपड़े का।
  4. ध्यान मुद्रा: आँखें बंद करके, मन को एकाग्र करें।
  5. गौरी माता की छवि: माता गौरी के सौम्य और श्वेत रूप की कल्पना करें। वे सफेद वस्त्र धारण किए हुए, श्वेत कमल पर विराजमान होती हैं। उनके हाथों में कलश, कमल और वर-मुद्रा होती है।
  6. मंत्र जाप: उपरोक्त ध्यान मंत्र का मन ही मन या धीमी आवाज़ में जाप करें।
  7. समर्पण: अंत में माता से अपनी प्रार्थना करें और उनकी कृपा हेतु आभार व्यक्त करें।

गौरी माता का ध्यान करने से मन में शांति, सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।


गौरी माता का ध्यान और उनके श्लोक का अर्थ उनके दिव्य स्वरूप, गुणों और आशीर्वादों का वर्णन करता है। नीचे गौरी माता के ध्यान श्लोक और उसका अर्थ दिया गया है:

गौरी माता का श्लोक:

"या श्रीः स्वधाऽस्वाहा सुधा मतिरहो योश्च सिद्धिः सदा
या वै सर्वविधाऽनुकूलचितता या सर्वमाता ध्रुवा।
या वै ब्रह्म सनातनी भगवती या चाश्रिता सर्वदा
सा मां पातु शुभाऽशुभेषु सततं श्री महादेवप्रिया॥"

श्लोक का अर्थ:

  1. "या श्रीः स्वधाऽस्वाहा सुधा मतिरहो योश्च सिद्धिः सदा":
    जो माता लक्ष्मी स्वरूपा हैं, जो यज्ञ में स्वधा और स्वाहा के रूप में पूजी जाती हैं, जो अमृतमयी हैं और बुद्धि प्रदान करने वाली हैं, वे सदा सिद्धि प्रदान करती हैं।

  2. "या वै सर्वविधाऽनुकूलचितता या सर्वमाता ध्रुवा":
    जो हर प्रकार से शुभ और अनुकूल हैं, जो सबकी माता हैं और सदा स्थिर हैं।

  3. "या वै ब्रह्म सनातनी भगवती या चाश्रिता सर्वदा":
    जो सनातन धर्म की पालनकर्ता हैं, जो परम भगवती हैं, और जिनकी शरण में सभी जाते हैं।

  4. "सा मां पातु शुभाऽशुभेषु सततं श्री महादेवप्रिया":
    वे शिव की प्रिय गौरी माता मुझे हर समय, शुभ और अशुभ दोनों परिस्थितियों में, सुरक्षित रखें।

भावार्थ:

गौरी माता को इस श्लोक में दिव्य शक्ति और जगत जननी के रूप में स्मरण किया गया है। वे लक्ष्मी, सरस्वती, और दुर्गा के रूप में हर प्रकार की सिद्धियों और कल्याण का स्रोत हैं। उनकी कृपा से जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।

इस श्लोक का जाप ध्यान और पूजा के समय करने से मन को शुद्धता और शक्ति मिलती है।

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