गणनायक विघ्न विनास करम करपल्लवा अंकुस पासधरम

यह श्लोक भगवान गणेश जी की स्तुति में लिखा गया है, जिसमें उनकी विशेषताओं और दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसका अर्थ निम्न प्रकार से समझा जा सकता है:

अर्थ:

प्रथम श्लोक:

  • गणनायक विघ्न विनास करम करपल्लवा अंकुस पासधरम
    "जो गणों के नायक (गणपति) हैं, विघ्नों का नाश करने वाले हैं, अपने सुंदर हाथों में अंकुश और पाश धारण करते हैं।"

  • धीरमंदित पंदित ज्ञान रतम
    "जो धीरता से संपन्न हैं, पंडितों को ज्ञान देने वाले हैं।"

  • प्रणमामि नमामि भवामि सूतं
    "मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ, बार-बार नमन करता हूँ और उनकी शरण में हूँ।"


द्वितीय श्लोक:

  • गज आनन कानन कुण्डलकं
    "जिनका मुख गज (हाथी) के समान है और कान पर सुंदर कुंडल शोभित हैं।"

  • कटि सोभीत पीत पतं सुघट घटयुग्म कलेवर नागयुतं
    "जिनका शरीर पीले वस्त्रों से सुशोभित है, और जिनके सुडौल शरीर के साथ नाग शोभा दे रहे हैं।"

  • प्रणमामि नमामि भवामि सुतां
    "मैं उन भगवान गणेश को प्रणाम करता हूँ, नमन करता हूँ और उनकी शरण में हूँ।"


यह श्लोक भगवान गणेश की महिमा और उनके दिव्य स्वरूप को वर्णित करता है। इसे ध्यान और स्तुति के समय गाया जा सकता है।

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