🔆 दीप ध्यानम् मंत्र 🔆
(दीप प्रज्वलन से पूर्व ध्यान मंत्र)
मूल मंत्र —
दीप जलाई उजास करो तब दूर करो मन का अंधियारा।
दीपक जलाकर उजाला करो, जिससे मन का अंधकार (अज्ञान) दूर हो।नेह सनेह बटे हर माहि जु पापहि ताप घटे अपधारा।
जिसमें तेल और बाती से स्नेह रूपी प्रेम फैले और सभी प्रकार के पाप व ताप नष्ट हों।दीप कमाल जरात लखे जनु व्योम भरा रजनीचर तारा।
दीपक की ज्योति ऐसे जलती है जैसे कमल के मध्य में अग्नि हो और आकाश में तारों के समान प्रकाश फैले।मंगलदायक दीप प्रकाशित तेज प्रकाश हरे तम नासा।
शुभ और पवित्र दीपक का प्रकाश अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट करता है और तेजस्विता प्रदान करता है।
🔸 मंत्र की विशेष व्याख्या:
-
दीपक केवल एक लौ नहीं है — यह ज्ञान, स्नेह, प्रेम, और आत्मचेतना का प्रतीक है।
-
नेह (तेल) और स्नेह (प्रेम), दोनों एक साथ जब बाती में समाहित होते हैं, तब वह दीप केवल प्रकाश नहीं देता, बल्कि अंतःकरण का परिष्कार करता है।
-
मंत्र में दीप की ज्योति को कमल के मध्य में अग्नि तथा रात्रि के आकाश में तारा कहा गया है — यह विवेक और दिव्यता का प्रतीक है।
-
यह दीप मंगलदायक है — अर्थात शुभ कार्यों का प्रारंभ इसी से होता है।
🪔 उपयोग का समय:
-
यह मंत्र दीप प्रज्वलन से ठीक पहले पढ़ा जा सकता है —
-
पूजा-पाठ,
-
आरती,
-
दीपावली,
-
या नित्य दीपदान जैसे अवसरों पर।
-

0 टिप्पणियाँ