विघ्ण-निवारण सब-सुख-कारण भक्त-उधारण देव-वरम

विघ्ण-निवारण सब-सुख-कारण भक्त-उधारण देव-वरम

दैत्या निवारण परसू धारण रिद्धी कारण देववरम गिरिजा माता सनमुख्यभ्राता शंकरत्रऻता सॏक्षकरम् भूसूर रक्षक मोदक भक्षक ज्ञानी लक्षक किरती करम्

 काटत बन्धन सवविधिखन्णन ओज अखन्णन विष्णुनिते

यह एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र जैसा प्रतीत होता है, जिसमें भगवान गणेश की स्तुति की गई है। इसमें उनके दिव्य गुणों और कार्यों का वर्णन किया गया है।

इसमें उल्लेख है:

  • भगवान गणेश "दुःख-निवारण" और "सुख-कारण" हैं।
  • वे अपने भक्तों का उद्धार करते हैं और दुष्टों का नाश करते हैं।
  • उनकी महिमा में कहा गया है कि वे रिद्धि-सिद्धि के कारण हैं और देवों में श्रेष्ठ हैं।
  • वे शिव-पार्वती के पुत्र और कार्तिकेय के भ्राता हैं।
  • उनके हाथ में मोदक हैं, और वे ज्ञानी एवं प्रतिष्ठा के दाता हैं।
  • वे बंधनों को काटते हैं, विधि-विधानों का पालन कराते हैं, और उनका तेज अखंड है।

यह श्लोक भगवान गणेश की महिमा और शक्ति को वर्णित करता है, जो उनके भक्तों को प्रेरणा और आशीर्वाद प्रदान करता है। क्या आप इसे और स्पष्ट रूप से या अन्य रूप में समझना चाहते हैं?

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